Thursday, April 11, 2019

जब तुम रूठती हो

सुनो, जब तुम रूठती हो 
बड़ी अच्छी लगती हो,
मासूम हो जाती हो और भी 
जिद पर जब अड़ती हो, 

कहती हो झूठ भी 
जब  बेबुनियादी से,   
सच कहता हूँ
सच से भी सच्ची लगती हो,

जब तुम रूठती हो 
बड़ी अच्छी लगती हो |

सुनाती हो जब 
बातें अटपटी सी,
थोड़ी मीठी 
थोड़ी चटपटी सी,
बच्चों से भी बच्ची लगती हो

जब तुम रूठती हो 
बड़ी अच्छी लगती हो |

ये जो बचपना है तुममे 
इसे खोने  न देना,
मुस्कुराना तुम हमेशा 
ये आँखें नम होने न देना ,
इरादों की तुम पक्की लगती हो 

जब तुम रूठती हो 
बड़ी अच्छी लगती हो |

चलि गयी वो

चलि गयी वो
यूं हाथ छुड़ा कर,
मासूम तरसती 
आंखों को रुलाकर,
जिये जो थे साथ
वो दिन वो रात,
वो बात और जज्बात 
सब एक साथ भुलाकर,

न रोने का वादा दिलाया
फिर मिलने का बहाना बनाकर,
और बढ़ी दवे से पाओं से
मेज़ से अपनी तस्वीर उठाकर,

समय से सोना
समय से खाना,
और अपना ध्यान रखना,
समझदारी के सब पाठ पढ़ाकर
,
चलि गयी वो
यूं हाथ छुड़ा कर
,
मासूम तरसती 
आंखों को रुलाकर।

निशाँ क़दमों के तेरे

सूखे पड़े है समंदर इश्क के 
बंजर ये दिल की ज़मीन हो गयी है,
हाल बुरा है, आँखों का रो रो कर ,
पलकें भी ये ग़मगीन हो गयी है

 ढूंढते है कदम भी मेरे,
निशाँ क़दमों के तेरे
अब कैसे समझाऊ इन्हें,
के साथ हम चले थे जिन रास्तो पर   
पत्थर, अब वो जमीन हो गयी है,   

तेरा जो कुछ सामान था मेरे पास 
वो जला दिया एक दिन, गुस्से में मैंने,
मन  मेरा लगा था तेरे बिना जिससे 
अब  वो तस्वीर भी तेरी कही खो गयी है|

पहली मुलाकात कर लूँ

झुकाती है जो पलके, तू देखकर मुझे 
ये शर्म है, या कोई अदा है तेरी ,
यूँ  बार-बार देखना मेरा, पसंद है तुझको 
या फिर कोई गुस्ताख, खता है  मेरी,

सोचता हु कई दिन से, 
की तुझसे बात कर लूँ 
रूबरू हो पहली, 
मुनासिब मुलाकात कर लूँ
कुछ तेरी सुनु, और 
कुछ अपनी  बयां कर लूँ  

जो तू इजाजत दे अपनी
तो आँखे तुझसे, मै चार कर लूँ,
और फिर भूल जाऊं खुद को 
के इस कदर तुझसे प्यार कर लूं 

सब यहीं है

हँसी ,ख़ुशी, दुःख और गम
सब यहीं  हैं, 
यही हैं तेरे दुश्मन  
और हमदम यहीं  हैं,
अच्छे, बुरे, झूठे और सच्चे  
जो भी हैं सारे धर्मं , 
सारे कर्म यही हैं 
किस दुसरे जहाँ की 
तलाश है बन्दे तुझको,
जन्नत यहीं है और 
जहान्नुम भी यही है

तेरा हमसफर

इंतज़ार किसका, तुझे इस कदर
क्यों है तू, खुद से ही, बेखबर
झुकी पलके, मासूम नज़र 
है तो बस इश्क़ की कसर

तलाश किसकी है तुझे
क्यों घूमती है दरबदर 
झांक कभी दिल मे अपने 
के मैं मिलूंगा, तेरा हमसफर

मुहब्बत

होने लगी है अब यादें धुंधली तेरी 
और तुझसे बिछड़ने  का गम भी गुजरने लगा है 
छोड़ दिया अब यादों में तेरी, रोना मैंने 
के अब कोई और,  मुझसे मुहब्बत करने लगा है

बीमार   किया था जिसने कभी मुझे 
तेरी आशिकी का, वो बुखार , उतरने लगा है
तबियत फिर से मेरी दुरुस्त हुई है      
क्योकि कोई और,  मुझसे मुहब्बत करने लगा है

That's what it takes to be true.

You speak only truth, is your lie
Truth is, you let your kindness die
You spoke harsh, in the name of truth
And did bad, for the sake of your own good,

Be careful what you say to other
And if you hear same and suffer
You for sure not doing great
You are just another hypocrite

If the truth, only you wish
You or them, don't distinguish 
Sharing your opinion is fine
Just remember to be even not divine

Even if you are right, you have no right
To criticize or judge other
The bad you do to them
Remember, the same you will suffer.

Kindness is the best way
Whatever you have to say
Speak, as it's for you
That’s what it takes, to be true.

Accept your mistakes and don't repeat
Want respect? Then you also greet.
Behave, as it's for you
That’s what it takes, to be true
Yes that's what it takes, to be true.

SHE...A narrative poem


There she was standing kinda lost
someone would help her, she hoped
a young soul seemed new to the place
having that innocent look on her face

A boy who barely talked to stranger
noticed and went ahead, to help her
What compelled him to do so?
May be same situation, he faced years ago

"May I help you?" he asked her
She replied "AA..I need a computer"
He fixed one, to her desk 
And that's how they met

story is not what you expect
it's more what he percept
love story ? not at all
she was never involved

she was a dream to him
like a hope beam to him
he saw affinity in her eyes 
or may be she was just being nice

And the years passed by
he wanted to say but never tried
forever it stayed in his heart
And they stayed ever apart

he wish to meet her again
just with an intent to explain
That he is sorry, if he ever hurt her
That he is sorry, if he ever disturb her
That he wish to be a true friend
And this is where,  the story end.

"Unsatisfied"



Sometimes I feel  
there is a lot in me 
And I am not able to express,

Sometime I feel
I don’t know nothing 
And I am blank or know very less,

Then I think
Why am I thinking all of this?
Does it mean something
Or all this is just rubbish?

Why the hell 
I am going into deep?
I should stop thinking
and go to sleep,

Is thinking that much right ?
It’s already 2:30 in the night,
This happens a lot with me
Am I crazy ? or just somehow "unsatisfied".

मेरी शक्सियत

अंदाजा मेरी शक्सियत का 
मेरी सूरत से ना लगाओ लोगों 
गर है इरादा जानने का मुझको  
तो पहले सीरत को मेरी, आजमाओ लोगों 

माना के शख्सियत मेरी खास नहीं है  
और कोई बड़ा इल्म भी मेरे पास नहीं है
पर जो भी मेरी पहचान या मेरा बजूद है   
कम से कम उसे तो ना मिटाओ लोगों, 
   
राय अपनी साझा करने से पहले 
ज़रा पहचानने की जहमत तो उठाओ लोगों 
यूँ ही अपनी फिजूल की चर्चा का 
मुद्दा मुझे ना बनाओ लोगों|

A Romantic poem "My dream"

Come !...hold my hand
let me take you to my dream, 
in the village, a small hut 
you, me and the breeze,

gradually flowing river 
And melody of bird's tweet, 
your head on my shoulder 
me comprised in you deep, 

Gentle touch of my hand 
And a  kiss on your cold cheek

come ! hold my hand
let me take you to my dream, 
in the village, a small hut
you, me and the breeze!

A poem "Blue"

Blue

Blue, color of sea
Blue, means harmony

Blue, color of sky
Blue, is to hope high

Blue, is faithfulness
Blue, means confidence

The color of Art is blue

Blue, is in me, 
Blue, is in you.

मै अब घर वापस होना चाहता हूँ

तबियत नासाज़ है कुछ दिनों  से 
और कुछ दिनों से थका सा हूँ,
दौड़  रहा था जीवन की दौड़ में  
और अब जैसे बस रुका सा हूँ ,

अब बस रुक कर सोना चाहता हूँ 
मै अब  घर वापस होना चाहता हूँ  |

फितरत कुछ मेरी बदली सी हो गयी है 
समझ जैसे कुछ धुंधली सी हो गयी है,
चिंता के भाव बने है चेहरे पर  
और मुस्कराहट भी ये नकली सी हो गयी है ,

जो भी पाया सब खोना चाहता हूँ 
मै अब  घर वापस होना चाहता हूँ |

कभी लगता था सब कुछ है मेरे पास 
ना  थी  कुछ और पाने की आस,
अब सब कुछ जैसे लुटा सा है 
अगर है तो बस खलीपन का एहसास,

माँ के आँचल से लिपट कर रोना चाहता हूँ 
मै अब  घर वापस होना चाहता हूँ |

सोचता था की मै सब सच कहता हूँ
और सब के झूठ  को सहता हूँ ,
मै भी झूठा हूँ ये कहना चाहता हूँ 
सच के परिणामों को सहना चाहता हूँ, 

अपने सब  पापों को धोना चाहता हूँ 
मै अब  घर वापस होना चाहता हूँ |

अब बस रुक कर सोना चाहता हूँ   
जो भी पाया सब खोना चाहता हूँ,
माँ के आँचल से लिपट कर रोना चाहता हूँ 
अपने सब  पापों को धोना चाहता हूँ,
की मै अब  घर वापस होना चाहता हूँ 

जब तुम रूठती हो

सुनो, जब तुम रूठती हो  बड़ी अच्छी लगती हो, मासूम हो जाती हो और भी  जिद पर जब अड़ती हो,  कहती हो झूठ भी  जब  बेबुनियादी से,    ...